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Thursday, September 2, 2010

ग़ज़ल-जन्माष्टमी......

है योमे अष्टमी दिल पर खुशी सी छाई है

किशन के जन्म की सब को बहुत बधाई है



हुआ है मुज़्तरिब बातिल उदास रह्ता है

कज़ा के खौफ ने दिल मे जगह बनाई है



छिटक के गिर गयी ज़ंजीर खुल गये ताले

पिता की गोद में जल्वा किशन कन्हाई है



योमे- दिन  ,  अष्टमी- आठवीं  (योमे अष्टमी -   जन्माष्टमी)   ,
मुज़्तरिब- बेचैन ,       बातिल- जो सत्य न हो, झूठ, मिथ्या,
नियम-विरुद्ध,निकम्मा  (यहा पर कंस के लिये या उस्के कार्य के अर्थ में)
क़ज़ा- म्रत्यु ,      खौफ- डर,      जल्वा- विराजमान

Wednesday, August 25, 2010

धनक बिखेर रहे अब्र ........

धनक   बिखेर   रहे  अब्र   क्या  फ़ज़ाऐं  हैं

फलक   पे   झूम  रहीं   सांबली  घटाऐं  हैं.


गुलो    बहार    बगीचे    हुये  दिवाने  से

अजीब   कैफ   मे    डूबी   हुई  हवाऐं  हैं .


हुई  ज़मीन  पे  बारिश  हुआ  ज़माना  खुश

खुशी  से  नाच  रहीं  आज  सब  दिशाऐं हैं .


चले   भी  आइए  हम  से  रहा  नही  जाता

हसीन  यार   तुम्हारी   सभी   अदाऐं   हैं.


तुमी  ने  इश्क  सिखाया  तुमी  हुये  गाफिल

कहो  न  यार  कहाँ   हुस्न  की   वफ़ाऐं  हैं.


हमे   खबर  न   हुई  और  हो  गये  बेदिल

बताइऐ   न    हमे   क्या   हुईं   खताऐं हैं .


सितम   न   कीजिए  बेचैन  हो   रहीं   साँसे

हुज़ुर   आइए   माह्क   कि   इल्तिजाऐं   हैं.

                       Dr. Ajmal khan "maahk" .

धनक- छटा,  अब्र-बादल, फलक- आसमान 
कैफ- खुशी,  गाफिल- लापरवाह,  इल्तिजा- निवेदन